इश्क़-ए-लखनऊ |

लखनऊ में मोहब्बत कभी जल्दी नहीं होती। यहाँ इश्क़ किसी फिल्म की तरह अचानक नहीं आता। वह धीरे-धीरे बातचीत में उतरता है, इंतज़ार में ठहरता है और फिर एक दिन एहसास बन जाता है। यह कहानी भी ऐसे ही इश्क़ की है। सर्दियों की शुरुआत थी। शाम के करीब पाँच बजे थे। आसमान सुनहरा हो चुका था और हवा में हल्की ठंड घुल गई थी। ज़ोया अपने काम से लौट रही थी। वह एक उर्दू पब्लिशिंग हाउस में काम करती थी। किताबें, कविताएँ और पुराने लफ़्ज़ उसकी दुनिया थे। उसे हमेशा लगता था कि मोहब्बत एक खूबसूरत ख़याल है, लेकिन हर किसी की किस्मत में नहीं होती।

 

उस दिन रास्ते में उसने एक छोटी सी किताबों की दुकान देखी और अंदर चली गई। पुरानी किताबों की खुशबू उसे हमेशा रोक लेती थी। वह एक किताब देख ही रही थी कि सामने से किसी ने वही किताब पकड़ ली। दोनों ने एक साथ हाथ पीछे खींच लिया। “आप ले लीजिए।”

उसने कहा। ज़ोया ने देखा। सामने एक लड़का था। साफ़ आवाज़, हल्की मुस्कान और हाथ में कुछ पुरानी किताबें। उसने कहा, “नहीं, पहले आपने उठाई थी।” ज़ोया मुस्कुराई। “आप पढ़ लीजिए, मैं फिर कभी ले लूँगी।” लड़का हँसा। “तो फिर कॉफी पर चर्चा कर लेते हैं।” ज़ोया थोड़ा चौंकी।

 

लेकिन उसकी बात में अजीब सा अपनापन था। उसने अपना नाम बताया—समीर। समीर एक लेखक था। वह शहर की छोटी-छोटी कहानियाँ लिखता था। दोनों दुकान के बाहर चाय पीने बैठ गए। शुरुआत किताबों से हुई। फिर शहर की बात हुई। फिर पसंदीदा मौसम। फिर उन बातों की जो लोग अक्सर किसी अजनबी से नहीं करते। समय कैसे निकल गया, दोनों को पता नहीं चला।

जाते समय समीर ने कहा— “उम्मीद है अगली किताब साथ चुनेंगे।” ज़ोया ने सिर्फ मुस्कुराकर सिर हिला दिया। उसके बाद मुलाकातें होने लगीं। कभी किताबों की दुकान।

कभी शाम की चाय। कभी लंबी सैर। समीर की आदत थी— वह हर चीज़ नोटिस करता था। ज़ोया को बिना चीनी की चाय पसंद है। उसे बारिश की आवाज़ अच्छी लगती है। और जब वह सोचती है तो अपनी उंगलियों से कप के किनारे पर निशान बनाती है। एक दिन दोनों शाम को टहल रहे थे। हल्की हवा चल रही थी। समीर ने पूछा— “तुम्हें मोहब्बत पर भरोसा है?” ज़ोया ने जवाब दिया— “शायद नहीं।”

“क्यों?” वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली— “क्योंकि लोग शुरुआत में रुकने की बातें करते हैं और बाद में चले जाते हैं।” समीर ने धीमे से कहा— “हर कहानी का अंत जाना नहीं होता।” ज़ोया ने उसकी तरफ देखा। उस दिन कुछ बदल गया। अब वे मिलने का बहाना नहीं ढूँढ़ते थे। मुलाकातें ज़रूरत बनने लगी थीं। एक शाम समीर उसे एक छोटी सी डायरी देकर बोला— “जब जो महसूस करो, इसमें लिख देना।”

ज़ोया ने पूछा— “तुम नहीं पढ़ोगे?” वह मुस्कुराया। “कुछ बातें लिखने वाले की होती हैं।” दिन गुजरते गए। डायरी भरने लगी। और शायद दिल भी। लेकिन तभी समीर को दूसरे शहर जाना पड़ा। एक बड़ी पब्लिशिंग कंपनी ने उसे काम के लिए बुलाया था। जाने से पहले दोनों मिले।

शाम पहले जैसी थी। लेकिन आज खामोशी ज़्यादा थी। समीर बोला— “अगर मैं दूर चला जाऊँ तो क्या हम बदल जाएँगे?” ज़ोया कुछ देर चुप रही। फिर बोली— “पता नहीं… लेकिन कुछ लोग जगह से नहीं, एहसास से जुड़े होते हैं।” समीर मुस्कुरा दिया। वह चला गया। कुछ हफ्ते सब ठीक रहा।

फिर काम बढ़ गया। बातें कम होने लगीं। ज़ोया फिर अपनी दुनिया में लौट गई। लेकिन अब हर किताब अधूरी लगती। एक दिन उसने वह डायरी खोली। आखिरी पन्ने पर कुछ लिखा था।

वह समीर की लिखावट थी— “अगर कभी लगे कि मैं दूर हूँ… तो उसी जगह आ जाना जहाँ पहली बार मिले थे।” उस शाम ज़ोया वहाँ पहुँची। वही किताबों की दुकान। वही हवा। और समीर। वह वहीं खड़ा था। उसने कहा— “मैं देखना चाहता था कि इश्क़ सिर्फ बातों में था या इंतज़ार में भी।” ज़ोया की आँखें भर आईं। वह मुस्कुराई। और बोली— “लखनऊ ने एक चीज़ सिखाई है…” समीर ने पूछा— “क्या?” वह बोली— “यहाँ मोहब्बत बोली नहीं जाती… निभाई जाती है।” समीर ने उसका हाथ थाम लिया। शाम धीरे-धीरे रात में बदल गई। और लखनऊ अपनी पूरी नर्मी के साथ उनके आसपास ठहरा रहा। शायद इसलिए कहते हैं— इश्क़ अगर कहीं सबसे खूबसूरत लगता है, तो वह है— इश्क़-ए-लखनऊ।

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